गाँव के किनारे एक छोटा-सा घर था। उस घर में मोहन अपनी माँ के साथ रहता था। मोहन अभी 12 साल का ही था, लेकिन ज़िंदगी ने उसे बहुत जल्दी समझदार बना दिया था। उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं थे। माँ खेतों में काम करती थी और मोहन पढ़ाई के साथ-साथ घर के छोटे-छोटे काम करता था।
गाँव में बिजली बहुत कम आती थी। कई-कई दिनों तक अंधेरा रहता। हर शाम मोहन मिट्टी का दीया जलाता और उसी रौशनी में पढ़ाई करता। दीये की लौ छोटी थी, लेकिन मोहन का सपना बड़ा था।
उसके दोस्त अक्सर हँसते थे।
“अरे, दीये की रौशनी में पढ़कर क्या बनेगा?”
मोहन कुछ नहीं कहता। वह बस अपनी किताबों में लगा रहता।
स्कूल में मोहन मेहनती था। जो बात उसे समझ में नहीं आती, वह बार-बार पूछता। एक दिन मास्टरजी ने कक्षा में पूछा,
“तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?”
बच्चों ने अपने-अपने जवाब दिए। जब मोहन की बारी आई तो उसने धीरे से कहा,
“मैं शिक्षक बनना चाहता हूँ, ताकि कोई बच्चा अंधेरे में पढ़ने को मजबूर न हो।”
मास्टरजी उसकी बात सुनकर सोच में पड़ गए। उन्हें लगा कि यह बच्चा कुछ अलग है।
शाम को वे मोहन के घर आए। दीये की मद्धम रौशनी में मोहन किताब पढ़ रहा था और माँ चूल्हे पर रोटी सेंक रही थी। मास्टरजी सब समझ गए। उन्होंने मोहन की मदद करने का फैसला किया।
कुछ समय बाद मोहन को छात्रवृत्ति मिल गई। उसी साल गाँव में बिजली भी आ गई। पहली बार मोहन के घर बल्ब जला। माँ की आँखों में खुशी के आँसू थे।
मोहन ने दीया बुझाया, लेकिन उसे फेंका नहीं। उसने उसे संभालकर रख लिया।
समय बीतता गया। मोहन पढ़ाई के लिए शहर गया। वहाँ मुश्किलें थीं, लेकिन उसने हार नहीं मानी। जब भी थक जाता, उसे दीये की रौशनी याद आ जाती।
सालों बाद मोहन शिक्षक बनकर अपने गाँव लौटा। उसी स्कूल में, जहाँ कभी वह दीये की रौशनी में पढ़ता था, अब वह बच्चों को पढ़ाने लगा।
पहले दिन उसने बच्चों से कहा,
“अगर ज़िंदगी में अंधेरा आए, तो रुकना मत। अपना दीया खुद जलाना।”
घर आकर उसने माँ के सामने वही पुराना दीया रखा।
माँ मुस्कुराई और बोली,
“ये दीया अब भी याद है?”
मोहन बोला,
“माँ, यही मेरी शुरुआत थी।”
और उस दिन मोहन ने समझ लिया कि
रौशनी बाहर से नहीं, अंदर से आती है।
